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સાતમ-આઠમે ધર્મના નામે જુગારનો અધર્મ શા માટે?

શું આપણે આપણા મુખ્ય તહેવારોમાં આપણી ઋષિ-મહર્ષિઓ, મહાપુરુષો ની શિક્ષાઓ અપનાવી રહ્યા છીએ કે એનો ત્યાજ્ય કરી રહ્યા છીએ? આપણાં તહેવારો માં આપણે મદ્યપાન, દ્યુત(જુગાર) વગેરે ને ફેશન બનાવી બેઠા છીએ આ કેટલું યોગ્ય છે શું આ આપણા પૂર્વજો ની શિક્ષાઓ છે??
અને ઉપરથી પોતાનો બચાવ કરવા જુગારીઓ એવી મિથ્યા વાત કરે છે કે મહાભારતમાં ભગવાન પણ રમતાં..!
મુર્ખાઓ..! આવી તથ્ય વીહોણી વાતો કરી ભગવાન નું અપમાન શા માટે કરો છો?
શ્રી કૃષ્ણ કહે છે કે,"नैतत् कृच्छ्रमनुप्राप्तो भवान् स्याद् वसुधाधिप । यद्यहं द्वारकायां स्यां राजन् सन्निहित: पुरा ।। आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोऽपि कौरवे: । वारयेयमहं द्यूतं बहून् दोषान् प्रदर्शयन् ।।" (મહાભારત વનપર્વ, અધ્યાય ૧૩, શ્લોક ૧,૨)
અર્થાત હે રાજન (યુધિષ્ઠિર) ! જો હું દ્વારકા માં અથવા તેના નજીક હોત તો તમે આ ભારી સંકટ માં ન પડત. હું કૌરવો ના વગર બોલાવે પણ એ દ્યુતસભા માં આવી જાત અને તે જુગારના અનેકો દોષ બતાવી એને અવશ્ય રોકત...
ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ આગળ પણ અનેકો આના વિષયક વાત કરી છે...(જે આમાં જોડેલા ચિત્ર માં વાંચવું)
જ્યારે પુર્ણ પુરુષોત્તમ યોગીરાજ શ્રી કૃષ્ણ સ્વંય જ જુગાર ના વિરોધી હતા …
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क्या आर्य बाहर से आये थे? शङ्का-समाधान

प्रश्न/शङ्का : "इस भूमि को उत्तम जानकर आर्य बहार से आकर यहां बस गये, अर्थात् वे भी यहां बसे हैं ।"
वे भी यहां बसे हैं इसमें कोई भिन्न मत नहीं किन्तु वे किसी भिन्न देश से आये उस में दोष है । भारतीय वाङ्गमय का मत है कि मनुष्यों की उत्पत्ति त्रिविष्टिप क्षेत्र में हुई अर्थात् आर्य(गुण-कर्म-स्वभाव श्रेष्ठ मनुष्य) भी वहां उत्पन्न हुएं । क्या आर्य बाहर से आये थे? आर्यों की भूमि कौनसी? आर्य किसे कहते हैं? अब यह प्रश्न होता है कि यह क्षेत्र कहां है?

इस क्षेत्र को दिव,नाक, स्वर्गलोक, देवलोक, त्रिदिव कहा जाता है । वहां सब मनुष्य बसते थे बहुत काल पश्चात् सभी का प्रव्रजन आरम्भ हुआ और वहां से मनुष्य हिमालय की चारों दिशाओं में गये, उस काल से कुछ वर्ष पूर्व हिमालय के चारों और समुद्र था, अर्थात् अन्य कोई मनुष्य किसी भाग में नहीं रहता था । दूसरी बात कि आर्य नामक कोई वंश वा नस्ल न तो थी और न ही है । आर्य सुसंस्कृत "समाज",  वर्ग वा समूह को कहते थे ।
योरपीयनों ने ही गोरे,लंबे-चौड़े,नील अक्षीय,अश्वारोही आर्य नामक नस्ल की बात घढ़ी है ,भारत के किसी भी आर्ष ग्रन्थ में आर्य नस्ल वा वंश का क…

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मनुष्यमात्र में समानता - वेदों का आदेश - वैदिक सुविचार

आर्यावर्त की यह प्रणालिका थी कि सम्राट् भी सामान्य मछुआरे पर अकारण बल प्रयोग नहीं कर सकता था ।

जन्मना वर्णव्यवस्था का रुढ़ उदय आर्यावर्त के सांस्कृतिक पतन का कारण बना ।

वर्णचयन पद्धति का नाश होने से वर्णव्यवस्था का स्वरुप बदल गया ।

महाभारत से १००० वर्ष पूर्व तक यह व्यवस्था डगमगाने लगी, तब से निरर्थक जातियों ने जन्म लेना आरम्भ कर दिया । उससे पूर्व लोह,सूत्र,कुम्भ,सूची,सूवर्णकारादि भृत्यादि वर्ग तो थे ही  ।

किन्तु उत्कृष्टोर्निकृष्ट, अस्पृश्यता, वर्णकलह नहीं था ।

आर्यों में समानता थी ।

यही वेद का आदेश था ।

आर्य कोई वंश,नस्ल वाचक शब्द ही नहीं ।

श्रेष्ठ मनुष्यों को आर्य कहते हैं ।

युरोपियनों से पूर्व किसी ने आर्य नस्ल की कल्पना तक नहीं की थी ।

शाक्यमुनि बुद्ध ने भी आर्य(श्रेष्ठ) होने का उपदेश दिया ।

भगवत् बुद्ध की मूर्तियों पर तिलक,यज्ञोपवीत,उपवस्त्र,मेखला,जटा, कमण्डल

ये सब आर्य संन्यासियों के ही चिह्न हैं ।

वो लोग धूर्त हैं जो आर्य—द्रविड़ वा आर्य—मूलनिवासी नामक बकवास बाते करते हैं ।

बुद्ध कहते हैं "एष धम्म सनन्तनो"
ये सनातन धर्म है ।

सनातन में उँच नीच को कोई स्थान नहीं ।

पर व…

अथर्ववेदाचार्य कल्किपात्र ऋषि मातंग देव - धणी मातंग देव का इतिहास

🌞"अथर्ववेदाचार्य कल्किपात्र ऋषि मातंगदेव"🚩 ये गाथा है उस ऋषि की ,उस आचार्य की ,उस गुरु की ,उस योगेश्वर की जिन्होंने सिंधु,कच्छ,सुराष्ट्र की भूमि को अपने पवित्र चरण कमलों से धन्य किया ,जिन्होंने भारतवर्ष के इन जनपदों में विदेशी म्लेच्छ आक्रान्ताओं के सामने प्रजा और राजाओं को लड़ने का आह्वान किया ।
सिंधुदेश,कच्छ,सुराष्ट्र के मेघवालों में मातंगदेव को महान कार्यों के कारण दशम अवतार माना गया ।
अथर्ववेदाचार्य कल्किपात्र ऋषि मातंग देव - धणी मातंग देव का इतिहास
संवत अठउ वरस नवमुं जसदे जायो बार । चयें जुगें जि वाचा परे, आयो कर दशमुं अवतार ।। माघमास करसन पख तथ त्रीज थावरुवार नखत्र मघा अम्रत चोघडियो गोतम रख जो दोयत्रो रख मात्रे जो विया सोज सामी संचरेओ से आय त्रीभोणे जो रा ।

अर्थात् मातंग देव का जन्म मात्रा ऋषि व जसदे देवी के घर विक्रम संवत् ८०९ महा मास कृष्ण पक्ष ३ तृतीया व शनिवार के दिन मघा नक्षत्र अमृत योग में हुआ था । वे गोतम ऋषि के दोहित्र थे ।

उन्होंने सिंध में म्लेच्छों के प्रभाव को रोकने के लिए सिंध,कच्छ,सुराष्ट्र के राजकुलों को एकजुट किया एवं मेघवालों में पुन: धर्म आचरण करने …

शूद्र किसे कहते हैं? क्या शूद्र हीन है? हिन्दू धर्म में शूद्र का स्थान

बहुतसे लोगों को भ्रान्ति होती है कि महर्षि मनु की प्राचीन वर्णव्यवस्था में भी यह शूद्र शब्द हीनार्थ में प्रयुक्त होता था, जबकि ऐसा नहीं था। इस तथ्य का निर्णय ‘शूद्र’ शब्द की व्याकरणिक रचना से हो जाता है। व्याकरणिक रचना के अनुसार शूद्र शब्द का अधोलिखित अर्थ होगा- ‘शु’ अव्ययपूर्वक ‘द्रु-गतौ’ धातु से ‘डः’ प्रत्यय के योग से "शूद्र" पद बनता है। इसकी व्युत्पत्ति होगी- ‘शू द्रवतीति शूद्रः’ = "जो स्वामी के कहे अनुसार इधर-उधर आने-जाने का कार्य करता है ।" अर्थात् जो सेवा और श्रम का कार्य करता है। संस्कृत वाङ्गमय में ‘शूद्र’ के पर्याय रूप में ‘प्रेष्यः’ =इधर-उधर काम के लिए भेजा जाने वाला, (मनु॰२/३२,७/१२५ आदि), ‘परिचारकः’ =सेवा-टहल करने वाला (मनु॰७/२१७), ‘भृत्यः’ =नौकर-चाकर आदि प्रयोग मिलते हैं। आज भी हम ऐसे लोगों को सेवक, सेवादार, आदेशवाहक, अर्दली, श्रमिक, मजदूर आदि कहते हैं, जिनका उपर्युक्त अर्थ ही है। इस धात्वर्थ में कोई हीनता का भाव नहीं है, केवल कर्मबोधक सामान्य शब्द है ।
शब्दोत्पत्ति के पश्चात् अब बात करते हैं आप के प्रश्न की, आप के प्रथम प्रश्न का भाव है कि चातुर्वर्ण्…